व्याख्या
1916 में एस्टोनिया में जन्मे पॉल केरेस द्वितीय विश्व युद्ध से पहले अंतरराष्ट्रीय अभिजात वर्ग तक पहुँच गए थे। 1938 में वे AVRO टूर्नामेंट में रूबेन फ़ाइन के साथ संयुक्त रूप से पहले स्थान पर रहे। इस टूर्नामेंट का नाम उसे आयोजित करने वाले डच प्रसारक पर रखा गया था और इसमें दुनिया के आठ सबसे मजबूत खिलाड़ी शामिल थे। टाइब्रेक नियम, यानी समान अंक वाले खिलाड़ियों को क्रम देने की द्वितीयक पद्धति, के आधार पर केरेस आगे रहे और खिताब के दावेदार के रूप में उनकी स्थिति मजबूत हुई।
युद्ध के बाद उन्होंने 1948 के उस टूर्नामेंट में भाग लिया जिसने विश्व चैंपियन तय किया। कुल मिलाकर उन्हें सात अवसरों पर विश्व खिताब का कैंडिडेट माना गया। यहाँ कैंडिडेट का अर्थ उस खिलाड़ी से है जो भविष्य के चुनौतीकर्ता को चुनने वाली प्रक्रिया के अंतिम चरणों तक पहुँचा हो। केरेस बार-बार करीब आए, लेकिन के लिए मैच खेलने का अधिकार कभी नहीं मिला। इस रिकॉर्ड से उन्हें "शतरंज का युवराज" उपनाम मिला।
वे तीन बार सोवियत चैंपियन भी रहे और कई में विजेता टीमों का हिस्सा बने। ओलंपियाड राष्ट्रीय टीमों की प्रमुख अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता है। उनकी टिप्पणियों वाली बाज़ी-संग्रह पुस्तकें क्लासिक बनीं, क्योंकि वे केवल चालों को नहीं बल्कि हर संघर्ष को आकार देने वाले निर्णयों और गलतियों को भी समझाती थीं।
प्रयोग और संदर्भ
केरेस का करियर दिखाता है कि किसी खिलाड़ी की शक्ति और प्रभाव को केवल विश्व खिताब रखने से नहीं मापा जा सकता।
स्रोत
- 1.Paul Keres, World Chess Hall of Fame
- 2.Paul Keres, Chess.com
- 3.2016: Year of Paul Keres, FIDE
- 4.History of the Candidates: From Budapest (1950) to Cyprus (2026), FIDE
