व्याख्या
तिग्रान पेत्रोसियन ने 1962 का कैंडिडेट्स टूर्नामेंट जीता, जो तय करता था कि विश्व चैंपियन को चुनौती देने का अधिकार किसे मिलेगा। उन्होंने 1963 में मिखाइल बोटविन्निक को हराकर नौवें विश्व चैंपियन का खिताब हासिल किया। 1966 में उन्होंने खिताब बचाया और 1969 में उसे गंवाया, दोनों बार उनके प्रतिद्वंद्वी बोरिस स्पास्की थे।
उनका नाम अक्सर रक्षात्मक खेल से जोड़ा जाता है, लेकिन यह वर्णन भ्रामक हो सकता है। पेत्रोसियन पोज़िशनल शतरंज खेलते थे, जिसमें मोहरों की जगह, प्यादों की संरचना और लंबे समय तक टिकने वाले लाभों पर ध्यान रहता है। वे प्रोफिलैक्सिस में भी निपुण थे: वे समझ लेते थे कि प्रतिद्वंद्वी क्या करना चाहता है और उसके ठोस खतरा बनने से पहले ही उस संभावना को समाप्त कर देते थे।
इस तरह बचाव करने का अर्थ निष्क्रिय होकर प्रतीक्षा करना नहीं था। पेत्रोसियन कभी-कभी प्रतिद्वंद्वी को आगे बढ़ने देते और फिर उस बढ़त से बनी कमजोरियों पर हमला करते थे। अपने शासनकाल के अलावा उन्होंने आठ चक्रों में भाग लिया और दस ओलंपियाड में सोवियत संघ का प्रतिनिधित्व किया। उनका करियर दिखाता है कि रोकथाम, धैर्य और टैक्टिकल गणना एक ही शैली के हिस्से हो सकते हैं।
स्रोत
- 1.Tigran Petrosian, World Chess Hall of Fame & Galleries
- 2.Tigran Petrosian, FIDE Open Chess Museum
- 3.Petrosian-Spassky 1966: contemporary annotations, Soviet Chess History / Douglas Griffin
